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इस डाकू का इतना था खौफ कि सीएम से पीएम तक थे परेशान

इस डाकू का इतना था खौफ कि सीएम से पीएम तक थे परेशान

भारत में एक समय था जब खतरनाक डाकुओं का खौफ हुआ करता था। भारत में बहुत से खतरनाक डाकू पैदा हुए हैं, जिन्होंने अपने आतंक से लोगों के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ी है। आज हम आपको एक ऐसे ही खतरनाक डाकू ‘छविराम’ के बारे में बता रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के औछा में जन्मे छविराम ने यूपी से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान तक अपना खौफ फैलाया था। बात 1970-80 के दशक की है, जब छविराम उत्तर प्रदेश का एक कुख्यात डाकू हुआ करता था। आतंक के दूसरे नाम छविराम के बारे में बताते वक्त लोगों की आज भी रूह कांप जाती हैं। छविराम एक ऐसा डाकू था, जिसके किस्से लोग एक दूसरे को सुनाया करते थे। बताया जाता है कि छविराम चाहे कितना भी दुर्दांत क्यों न था, लेकिन वो और उसका गिरोह कभी भी महिलाओं पर अत्याचार नहीं करता था। छविराम लोगों को लूटने में माहिर था, वो हमेशा अपने दिमाग के बल पर लोगों के घरों में डकैती किया करता था और भाग जाया करता था। उस दौर के लोगों ने छविराम के बारे में बताया कि किस तरह से वो लूट और हत्याओं को अंजाम दिया करता था।

छविराम यादव लोगों के साथ-साथ सरकार के लिए भी दिक्कत का विषय बन गया था। छविराम ने पुलिस की नाक में दम कर दिया था, जिसको लेकर राजनीति भी खूब गर्माने लगी थी। एक दौर आया जब छविराम का आतंक बहुत ज्यादा बढ़ गया और सरकार ने उसे किसी भी कीमत पर जिंदा या मुर्दा पकड़ने के आदेश दिए। अब पुलिस पर नेताओं का बहुत दबाव था कि किसी भी तरीके से छविराम को गिरफ्तार किया जाए या फिर एनकाउंटर में मार गिराया जाएगा। छविराम ने सिर्फ यूपी ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी आतंक फैलाया था, इसलिए उसके पीछे तीनों राज्यों की पुलिस लगी हुई थी। छविराम ज्यादातर मैनपुरी ही रहा करता था, इसलिए तीनों राज्यों की पुलिस उसे और उसके गिरोह को मैनपुरी में ही ज्यादातर ढूंढा करती थी।

छविराम को उसके गिरोह के लोग नेताजी कहते थे। लूट करके जो भी माल एकत्रित होता था उसे गिरोह में बराबर बाट दिया जाता था। हद तो सन् 1982 में हुई जब छविराम ने एटा के अलीगंज तहसील के तत्कालीन सीओ को पकड़ कर यूपी सरकार को चुनौती दी। हालांकि छविराम ने 1 दिन बाद ही सीओ को छोड़ दिया, लेकिन इस घटना से प्रदेश सरकार की खूब बेइज्जती हुई और छविराम की हिम्मत और ज्यादा बढ़ी। उस दौरान यूपी में अपराध के और किस्से सामने आए तो देश की तत्कालील पीएम इंदिरा गांधी ने यूपी के सीएम को छविराम के एनकाउंटर का आदेश दिया। उसके बाद वीपी सिंह ने प्रदेश की पुलिस को छविराम के पीछे लगा दिया और उसे किसी भी कीमत पर जिंदा या मुर्दा सामने पेश करने के लिए कहा। मैनपुरी के नेताओं से छविराम के आत्मसमर्पण के बारे में भी कहा गया। चार-पांच महीने तक इस मुद्दे पर काम किया गया और छविराम और उसके गिरोह को आत्मसमर्ण के लिए भी राजी किया गया, लेकिन केंद्र सरकार का आदेश था कि आत्मसमर्पण नहीं बल्कि एनकाउंटर चाहिए।

तत्कालीन एसपी कर्मवीर सिंह ने बड़ी ही बहादुरी के साथ छविराम और उसके गिरोह को बरनाहल ब्लाक के पास सेंगर नदी की तलहटी पर घेर लिया। पुलिस के साथ कुछ जवानों ने छविराम और उसके गिरोह को घेर लिया और लगभग 20 घंटों तक मुठभेड़ चली। छविराम के साथ-साथ 8 डकैतों को मौत के घाट उतार दिया गया। जैसे ही यूपी के सीएम वीपी सिंह को छविराम के एनकाउंटर के बारे में पता चला तो वो सीधे मैनपुरी पहंचे और पुलिस की पीठ थपथपाई। मैनपुरी में कोतवाली के सामने क्रिश्चियन मैदान में छबिराम के साथ 8 डाकुओं की लाशें लकड़ी पर लटकाई गई ताकि लोगों को पता चल सके कि बुराई का अंत क्या होता है।

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