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इस शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा कृष्ण जन्माष्टमी, जानिए…

इस शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा कृष्ण जन्माष्टमी, जानिए…

Religion /  धर्म

। नटखट अदाओं से मन मोह लेने वाले भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन की तैयारियां शुरु हो गई है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण का जन्म भादो माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पूर्व भारत में विशेष महत्व है।

इस बार कृष्ण जन्माष्टमी दो दिन यानि 2 सितंबर और 3 सितंबर दोनों ही दिन मनाया जाएगा। 2 सितंबर को मंदिर और ब्राहम्णों के घर और 3 सितंबर को वैष्णव संप्रदाय के लोग इस महापर्व मनाते है।

श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। देश के सभी राज्यों में अलग-अलग तरीके से इस पर्व को मनाया जाता है। इस दिन हर कोई बाल गोपाल के जन्म की खुशी में दिन भर व्रत रखते है। हर जगह कृष्ण की महिमा का गुणगान होता है। दिन भर घरों और मंदिरों में भजन-कीर्तन होते है। स्कूलों में श्रीकृष्ण का मंचन होता है और झांकियां निकाली जाती है।

जन्माष्टमी का शुभ मुहूर्त-

इस बार अष्टमी 2 सितंबर की रात 8 बजकर 47 मिनट पर लगेगी और 3 सितंबर को सांय 7 बजकर 20 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।

  • अष्टमी तिथि प्रारंभ- 2 सितंबर रात 8 बजकर 48 मिनट
  • अष्टमी तिथि समाप्त- 3 सितंबर शाम 7 बजकर 20 मिनट
  • रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ- 2 सितंबर रात 8 बजकर 48 मिनट
  • रोहिणी नक्षत्र समाप्त- 3 सितंबर रात 8 बजकर 5 मिनट

कृष्ण जन्माष्टमी का इतिहास-

 

पौराणिक मान्याताओं के अनुसार द्वापर युग मथुरा में कंस नाम का राजा था और उनकी एक चचेरी बहन देवकी थी। कंस अपनी बहन देवकी से बेहद प्यार करता था। उन्होंने उनका विवाह वासुदेव नाम के राजकुमार से हुआ था। देवकी के विवाह के कुछ दिन पश्चात ही कंस को ये आकाशवाणी हुई की देवकी की आठवीं संतान उसका काल बनेगा।

यह सुनकर कंस तिलमिला गए और उसने अपनी बहन को मारने के लिए तलवार उठा ली, लेकिन वासुदेव ने कंस को वादा किया कि वो अपनी आठों संतान उसे दे देंगे मगर वो देवकी को ना मारे। इसके बाद कंस ने देवकी और वासुदेव को मथुरा के ही कारागार में डाल दिया। देवकी के सातों संतान को कंस ने बारी-बारी कर के मार डाला।

जब देवकी ने आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण को जन्म दिया तो उन्हें कंस के प्रकोप से बचाने के लिए गोकुल में अपने दोस्त नंद के यहां भिजवा दिया। कहते है कृष्ण के जन्म के समय उस रात कारागार में मौजूद सभी लोग निंद्रासन में चले गए थे।

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