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आस्था

गुरु गोबिंद सिंह: जिन्होंने एक सिख को सवा लाख के बराबर बना दिया था

गुरु गोबिंद सिंह: जिन्होंने एक सिख को सवा लाख के बराबर बना दिया था

गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें और आखिरी धर्मगुरु थे। सिख धर्म के उत्थान और सिखों को एकता के धागे में बांधने का श्रेय गुरु गोबिंद सिंह को ही है। वे एक अद्भुत व्यक्तित्व के मालिक थे। उनके चेहरे से हमेशा तेज चमकता रहता था। वो तेज ऐसा था कि जिसने मुगल सम्राट औरंगेजब तक को भयभीत करके रख दिया था।

गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसम्बर, 1666 को पटना साहिब, बिहार में हुआ था। वे गुरु तेग बहादुर और गुजरी जी की एकलौती संतान थे। उनका नाम गोबिंद राय रखा गया। बचपन से वे अलौकिक गुणों से सम्पन्न थे। जन्म के समय उनके पिता और सिख गुरु तेग बहादुर सिंह बंगाल और असम में उपदेश देने के लिए गए थे। इस वजह से 4 साल तक गुरु गोबिंद सिंह पटना में ही रहें। जिस घर में उनका जन्म हुआ था, वो आज “तख्त श्री पटना हरिमंदर साहिब” के नाम से जाना जाता है।

1970 में उनका परिवार पहले पंजाब और फिर हिमालय की पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नाम की जगह पर आ गया। यहीं पर गुरु गोबिंद सिंह की शिक्षा-दीक्षा आरम्भ हुई। यहां पर उन्होंने उर्दू, फारसी की पढ़ाई करने के अलावा तलवारबाजी और सैन्य अभ्यास की भी शिक्षा ली। उनका ये अभ्यास और शिक्षा बाद में मुगलों से टक्कर लेने में काफी मददगार साबित हुआ। चक्क नानकी नाम की जिस जगह पर गुरु गोबिंद सिंह की शिक्षा-दीक्षा हुई थी, वो आनंदपुर साहिब के नाम से जाना जाता है।

गुरु गोबिंद सिंह के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ 1675 में आया। उनके पिता और सिख गुरु तेगबहादुर जी कश्मीरी पंडितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाए जाने का विरोध कर रहे थे। औरंगजेब को जब ये बात चला तो उसने गुरु तेगबहादुर पर भी इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया। जब उन्होंने इंकार किया तो मुगल बादशाह ने 11 नवम्बर, 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक पर सबके सामने उनका सिर काट दिया। यहां से सिख और मुगलों की दुश्मनी चरम पर पहुंच गई।

अपने पिता और सिख गुरु की मौत के बाद 29 मार्च 1676 को, बैशाखी के दिन वे सिखों के दसवें गुरु के रूप में गद्दी पर बैठे। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगलों के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाल लिया। वे छोटी सी सैनिकों की टोली लेकर मुगलों से टक्कर लेते रहते थे। उनका कहना था कि एक सिख सवा लाख के बराबर है।

वैवाहिक जीवन

गुरु गोबिन्द सिंह की तीन पत्नियां थीं। 21 जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किमी दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फतेह सिंह नाम के तीन बेटे हुए। 4 अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनसे भी एक बेटा हुआ, जिसका नाम अजित सिंह रखा गया। 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। इनसे कोई संतान तो पैदा नहीं हुई, लेकिन सिख समुदाय पर इनका काफी व्यापक प्रभाव था।

खालसा पंथ

गुरु गोबिंद सिंह ने सिख धर्म और सिख समुदाय के कल्याण के लिए कई सारे नए कदम उठाए। उनके ज्ञान और मार्गदर्शन में सिख समाज ने काफी उन्नति की। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की। साल 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने पत्र भेज कर देश के कोने-कोने से सिखों को आनंदपुर साहिब बुलाया। उनके बुलाने पर अस्सी हजार से भी ज्यादा सिख आनंदपुर साहिब उपस्थित हुए।

सभा में उपस्थित लोगों के सामने गुरु गोबिंद सिंह जी आगे बढ़े और म्यान में से अपनी तलवार निकाकर मंच के बीच में जाकर ऊंची आवाज में बोले, “मेरी संगत मेरे लिए सबसे प्यारी है। मेरी संगत मेरी ताकत है, मेरा सब कुछ है। लेकिन क्या आप सब में से ऐसा कोई है, जो अभी, इसी वक्त मेरे लिए अपना सिर कलम करवाने की क्षमता रखता हो? तो लाहौर के एक सिख भाई दयाराम उठे। उन्हें गुरु साहब निकट के छोटे तंबू में ले गए। इसी तरह से वे 4 और लोगों का सिर कलम करने के लिए तंबू के अंदर ले गए।

लेकिन, उस समय लोग आश्चर्यचकित हो गए जब कुछ समय बाद गुरु गोबिंद सिंह केसरिया वस्त्रों में सजे उन पांचों सिखों को लेकर आए। गुरु साहब ने लोहे के बाटे में पानी और बताशे डाल कर खंडे से तैयार अमृत उन पांचों सिखों को पिलाया और कहा कि ये सभी अब सिंह बन गए हैं। मान्यता है कि गुरु गोबिंद सिंह के पंच प्यारों को स्वयं गुरु जी द्वारा ही कुछ अधिकार प्रदान किए गए थे।

गुरु साहिब ने खालसा की स्थापना की घोषणा की और सिखों से कहा कि वे भी अमृत पान कर पांच ककार धारण करें और सिंह के नाम से जाने जाएं। आज भी हर सिख के लिए पांच ककार अर्थात् केश, कच्छा, कड़ा, कंघा और कृपाण धारण करना अनिवार्य माना जाता है। बैसाखी को खालसा पंथ की स्थापना के रूप में मनाया जाता है।

गुरु साहब, औरंगेजब के जीवन पर्यन्त उसके साथ युद्ध करते रहें। हालांकि, औरंगेजब की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठे उसके पुत्र बहादुरशाह के साथ गुरु साहब के रिश्ते काफी अच्छे थे।

मृत्यु

युद्ध के समय एक बार उनकी छाती में गम्भीर में गम्भीर चोट लग गई थी। जिसके कारण 18 अक्टूबर, 1708 को 42 वर्ष की आयु में नांदेड़ में उनकी मृत्यु हो गयी। अपनी मृत्यु से पहले ही उन्होंने घोषणा कर दी थी कि उनके बाद कोई भी सिख गुरु नहीं बनेगा। उन्होंने आदेश दिया कि मेरे बाद ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को ही गुरु माना जाए।

गुरु साहब के बारे में कट्टर आर्य समाजी लाला दौलत राय ने लिखा है कि,

“मैं चाहता तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, परमहंस आदि के बारे में काफी कुछ लिख सकता था, लेकिन मैं उस व्यक्ति के बारे में लिखना चाहता था जो कि पूर्ण पुरुष हो। मुझे पूर्ण पुरुष के सभी गुण गुरु गोबिंद सिंह में मिलते हैं।”

दौलतराय ने बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी पर एक बेहद ज्ञान किताब लिखी। दौलत राय के अलावा मुहम्मद अब्दुल लतीफ ने गुरु साहब की काफी तारीफ की है। लतीफ ने लिखा है कि,

“जब मैं गुरु गोबिंद सिंह जी के व्यक्तित्व के बारे में सोचता हूँ तो मुझे समझ में नहीं आता कि उनके किस पहलू का वर्णन करूं। वे कभी मुझे महाधिराज नजर आते हैं, कभी महादानी, कभी फकीर नजर आते हैं, तो कभी वे गुरु नजर आते हैं।“

 

 

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