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आस्था

जगतपिता हैं ब्रह्मा, लेकिन श्राप के कारण धरती पर सिर्फ एक जगह होती है उनकी पूजा

जगतपिता हैं ब्रह्मा, लेकिन श्राप के कारण धरती पर सिर्फ एक जगह होती है उनकी पूजा

ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सृष्टि का आधार माना जाता है। सृष्टि का सारा कार्यभार इन्हीं लोगों के ऊपर रहता है। ब्रह्मा ने जहां इस संसार की रचना की तो वहीं विष्णु भगवान पर इस संसार के पालन का भार है। महादेव को इस दुनिया को विनाश करने वाली शक्ति माना जाता है। लेकिन, ब्रह्मा के जगतपिता के होने के बावजूद, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इस धरती पर उनका सिर्फ पुष्कर में एक मंदिर है। जबकि विष्णु भगवान और भोलेनाथ का मन्दिर आपको देश के हर कोने में मिल जाएंगे। ब्रह्मा का सिर्फ एक मंदिर होने के पीछे का कारण भी काफी दिलचस्प है।

दरअसल, एक बार संसार के कल्याण के लिए ब्रह्म देव के मन में यज्ञ करने का ख्याल आया। इसके लिए उन्हें उपयुक्त जगह थी। जगह के चुनाव के लिए उन्होंने अपने बांह से निकले हुए कमल को धरती पर गिराया। वो फूल राजस्थान के पुष्कर में गिरा। इसके बाद ब्रह्मा यज्ञ के लिए उस जगह पर पहुंचे।

यज्ञ की सारी तैयारियां हो चुकी थीं, लेकिन ब्रह्म देव की पत्नी सावित्री समय पर नहीं आ पाईं थी। उधर यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। इस वजह से ब्रह्मा जी ने एक स्थानीय ग्वाल बाला से शादी कर ली और यज्ञ के लिए बैठ गए।

कुछ ही समय के पश्चात वहां पर सावित्री भी पहुंच गईं। वहां यज्ञवेदी पर अपनी जगह किसी और स्त्री को देखकर उन्हें भयानक क्रोध आया। उसी क्रोध में उन्होंने ब्रह्मदेव को श्राप दे दिया कि जाइए, इस धरती पर न ही कहीं आपका मंदिर होगा और न ही कहीं आपकी पूजा होगी। सावित्री के क्रोध को देखकर सभी देवता भयभीत हो गए। वे सभी उनसे अपना श्राप वापस लेने के लिए अनुनय-विनय करने लगें। लेकिन, सावित्री ने अपना श्राप वापस नहीं लिया। हालांकि, क्रोध शान्त होने पर उन्होंने कहा कि ब्रह्म देव की पूजा सिर्फ पुष्कर में ही होगी। अगर इसके अलावा कहीं भी कोई ब्रह्म देव का दूसरा मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।

तब से लेकर आज तक सिर्फ पुष्कर के मंदिर में ही ब्रह्म देव की पूजा होती है। हालांकि, आज तक किसी को इस बात का पता नहीं चला कि इस मंदिर का निर्माण कैसे हुआ। लेकिन, आज से लगभग 1200 साल पहले अरण्व वंश के एक राजा ने स्वप्न देखाथा कि इस जगह पर एक मंदिर है। उस मंदिर के सही रख रखाव की जरूरत है। तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे की मरम्मत करवा कर, इसका सुंदरीकरण करवाया। लेकिन, उस राजा के बाद जिसने भी ऐसे मंदिर का निर्माण कराने की कोशिश की, वो या तो पागल हो गया या फिर उसकी मौत हो गई।

हालांकि, भगवान ब्रह्मा के इस मंदिर में आकर लोगों को एक अलग ही तरह का आध्यात्मिक अहसास होता है। कई पर्यटक और श्रद्धालु तो ऐसे भी हैं, जो यहां आते हैं तो फिर यहीं के होकर रह जाना चाहते हैं।

 

 

 

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