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ध्यान केंद्रित करना सीखना

ध्यान केंद्रित करना सीखना

जोधपुर आश्रम के 84 वर्षीय सरल और विनम्र स्वभाव वाले गुरु सियाग, साधकों से हमेशा केवल गुरुवार को मिलना पसंद करते हैं। प्रत्येक गुरुवार वे अपने शक्तिपात दीक्षा संस्कार कक्षाओं को मैदानों, अस्पतालों, और यहाँ तक कि जेलों में भी आयोजित करते हैं ताकि आम आदमी को आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर किया जा सके। जोधपुर के अध्यात्म विज्ञान सत्संग केंद्र के मृदु स्वभाव के सद्गुरु, राम लालजी सियाग कहते हैं कि उनका आश्रम इन दीक्षा संस्कार कार्यक्रमों के ख़र्चे वहन करता है और वे इन कार्यक्रमों के लिए कोई प्रायोजक नहीं ढूँढते हैं।

 

विशेष मंत्र

पश्चिमी राजस्थान के कोटा, जोधपुर और बीकानेर तथा गुजरात के कई स्थानों के घरों में इनका नाम काफी लोकप्रिय है। इन स्थानों पर वे नियमित रूप से कई बार जाते रहते हैं। सिद्ध चिंतन के साथ वे एक मंत्र देते हैं। इसके बाद, राह एकदम आसान हो जाती है। उनकी तस्वीर के सामने मंत्र के साथ चिंतन करें। उनकी तस्वीर को ध्यान के केंद्र के रूप में अपने आज्ञा चक्र पर 15 मिनट के लिए लगाएँ। यह चिंतन प्रत्येक सुबह (और शाम) ख़ासतौर पर सुबह के नित्यकर्म के बाद करें। ख़ाली पेट या फिर खाने के दो घंटे के बाद लाभदायक होता है। मंत्र को होंठों को हिलाए बिना शांति से बोलें।

 

गुरु सियाग के चिंतन के अनुयायी कहते हैं कि डायबिटीज़, रक्तचाप और सभी प्रकार के लत इस चिंतन से दूर हुए हैं। कई कहते हैं कि इस चिंतन की सहायता से वे एड्स और कैंसर जैसी बीमारियों से भी निजात पा चुके हैं। कई औरतें कहती हैं कि सिर्फ़ टीवी या यूट्यूब पर बजनेवाले इस मंत्र की आवाज़ से ही उनके पतियों ने कई लत छोड़ दिए हैं और सात्विक बन गए हैं।

 

राजस्थान के पालना गाँव में पैदा हुए गुरु सियाग के सर से पिता की छाया तीन वर्ष की आयु में ही छिन गई थी। परिवार के आर्थिक रूप से बहुत गरीब होने के कारण उनका पालन-पोषण एक अनाथालय में हुआ था। बड़े होकर वे बीकानेर में क्लर्क के रूप में भारतीय रेलवे से जुड़े।

 

“मुझे लगातार आध्यात्मिक संकेत मिलते रहते थे, लेकिन मुझे यह पहचानने के लिए समय ही नहीं मिला-वर्ष 1968 तक भी नहीं,” वे कहते हैं।

 

यह वही समय था जब उन्हें नींद में, चिंतन अवस्था में गायत्री मंत्र की सिद्धि प्राप्त हुई। जल्द ही उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उपदेशों को पढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें एक गुरु की कमी महसूस होने लगी। अपनी रेलवे की नौकरी छोड़कर वे गुरु की ख़ोज में निकल पड़े। वे बाबा गंगाईनाथजी योगी से उनके बीकानेर आश्रम में जुड़े। बाबाजी की मृत्यु के बाद, चिंतन सत्र में भगवान कृष्ण के सिद्धि के रूप में शक्तिपात दीक्षा संस्कार प्राप्त किया। जैसा कि सद्गुरु कहते थे कि वे भाग्यवान थे कि उन्हें निर्गुणनिराकार सिद्धि और सगुणसाकार सिद्धि दोनों की प्राप्ति एक ही जीवनकाल में हो गई थी।

 

कंपन का विज्ञान

डेवलमेंट मीडिया विशेषज्ञ और अनुयायी कुलदीप रतनू कहते हैं, “यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी है।” इन्होंने 15 वर्ष पहले जोधपूर में विद्यार्थी के रूप में चिंतन में प्रवेश किया था। सद्गुरु ने उन्हें मंत्र उच्चारण के सकारात्मक कंपन संबंधी पुस्तक में से अनुच्छेद पढ़ने के लिए आदेश दिया। यह आध्यात्मिक अभिलाषी व्यक्ति की कुंडलिनी शक्ति को जागृत करती है। सद्गुरु सियाग दिव्य संजीवनी मंत्र द्वारा शक्तिपात दीक्षा प्रदान करते हैं।

 

आध्यात्मिक चिंतन के दौरान, शरीर की शुद्धि के लिए जागृत कुंडलिनी कुछ यौगिक गतिविधियों और प्राणायाम को प्रोत्साहित करता है। “वह हवा जो आपके नीचे से ऊपर मुकुट चक्र की ओर जाती है, वह शरीर के उस हिस्से से होकर गुजरती है जहाँ कोई बंधन या अवरोध होता है और यह स्वचालित रूप से ठीक हो जाता है।” कहते हैं सद्गुरु सियाग। “यदि आपकी कुंडलिनी जागृत होती है, तो इससे आपकी शरीर की कोशिकाओं में परिवर्तन होता है। यह इसलिए होता है क्योंकि जागृत कुंडलिनी आपकी पूरी प्रणाली को संतुलित और नियंत्रित करती है।”

 

वे कहते हैं, “इसके बाद आपका प्राण, शरीर, मन और बुद्धि आपके नियंत्रण में आ जाते हैं।” इस बात पर अधिक विश्वास करना मुश्किल नहीं है। नियमित चिंतन करने के बाद शरीर में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों की पुष्टि वैज्ञानिक अध्ययन से भी हुई है। दलाई लामा पिछले कई वर्षों से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में ऐसे अध्ययनों के लिए धनराशि की सहायता प्रदान करते आ रहे हैं और इस बात को चरितार्थ कर रहे हैं कि चिंतन से मस्तिष्क में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं।

 

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