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मनोरंजन

भंसाली की ‘पद्मावती’ फ़िल्म है,इतिहास की किताब नहीं

भंसाली की ‘पद्मावती’ फ़िल्म है,इतिहास की किताब नहीं

पद्मावती कब रिलीज होगी भाई? इस फिल्म को लेकर बवालियों ने इतना बवाल काटा कि अब इंतजार बर्दाश्त के बाहर है। बीच में तो मामला शांत था लेकिन फिर से जूतमपैजार शुरू है। पद्मावती है, नहीं हैं, अलाउद्दीन उसको चाहता था, चाहेगा कैसे, पद्मावती थी ही नहीं…जितने मुंह उतनी बातें। सुन-सुन के तोते उड़ गए हैं। पद्मावती के तोते भी ऐसे ही उड़े होंगे। अरे भाई हम पद्मावती के फ्रेंड की बात कर रहे हैं। हिरामन तोता की। पद्मावती का बचपन का फ्रेंड था वो, लेकिन पद्मावती के पापा को तोते से बेटी की दोस्ती पसंद नहीं थी। जब तोते को उन्होंने धमकियाया तो वह भगोड़ा चाइल्डहूड फ्रेंडशिप की परवाह किए बगैर घर छोड़ के भाग गया। आजाद भारत में पद्मावती को लेकर जो आग लगी है न, उसके रियल खलनायक यही हिरामन और राघव चेतन थे।

छोटा चेतन नहीं…राघव चेतन…उतावले न हों, बताऊंगा, कौन था राघव चेतन। रतन सेन उस समय के एक राजा थे। हिरामना ने ही तो रतन सेन को बताया था कि कायनात में पद्मावती से सुंदर कोई नहीं है। रही बात राघव चेतन की तो भंसाली के तंबू में आग इसी ने लगाई थी। चौंकिए मत, आगे पढ़िए। पद्मावती के पति राजा रतन सेन ने राघव चेतन को अपने राज्य से धोखाधड़ी के आरोप में निकाल दिया था। राजा जी को क्या पता था कि जिसे वो राज्य से निकाल रहे हैं, वो उनकी पत्नी को ही उड़ा ले जाने की साजिश रच देगा।

राघव चेतन ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को जाकर बता दिया कि पद्मावती गजब सुंदर है। क्या जरूरत थी इसे पद्मावती के बारे में अलाउद्दीन को बताने की। छिछोरा कहीं का, फोकट में भंसाली को पिटवा दिया। न चेतन अलाउद्दीन को पद्मावती के बारे में बताता और न ही भंसाली फिल्म बनाते। तो अब समझे, भंसाली की तंबू में आग किसके कारण लगी थी?

पूरी कहानी बता दिए न तो अब आ जाएं मेन मुद्दे पर? तो पढ़िये। जनता को कौन बताए कि पद्मावती कल्पना हो सकती है लेकिन अलाउद्दीन नहीं। और जब अलाउद्दीन कल्पना नहीं था, तो पद्मावती को दर्शक कल्पना कैसे मान लें? पद्मावती को कल्पना मानने का मतलब यह हुआ कि जीता-जागता सुल्तान दीवार से प्यार कर रहा था। सिर पटक लो, लहूलुहान कर के पूरे शरीर पर हल्दी-चूना थोप दो, लेकिन जनता ने कसम खा ली है कि वो पद्मावती को कल्पना नहीं मान सकती।

अब पद्मावती थी या नहीं थी, तुमहीं फुर्सत में हो और बैठके फैसला करो, हमें इस पचड़े में नहीं पड़ना। हम तो बस इतना जानते हैं कि जहां दिलचस्पी होती है, पब्लिसिटी भी वहीं मिलती है। और नहीं तो का। अपने संजय को देखो न। खा गये न गच्चा। अरे वही संजय जो रामलीला बनाये थे, लेकिन उस फिल्म में कोई अउरे लीला चलत रहा। कितने बाबू लोग तो रामलीला ही देखने गए थे, लेकिन रासलीला देख के चले आए। अउर खुश भी खूब हुए कि गजबे प्रियंका ने डांस किया था। तो कुछ सीखे संजय भाई से कि किस तरह से लीला की जाती है। अइसे ही आपन नाम थोड़े ही न रखे हैं संजय लीला भंसाली। माल्या को भी लोग हल्के में लेते थे। उसकी कंपनी का नाम था किंगफिशर। भाग गया न गोता लगा के।

हमार कहने का मतलब है कि संजय लीला भंसाली जी का एक ही मकसद है दिलचस्पी पैदा करना और उस दिलचस्पी से लोकप्रियता हासिल करना। तुम संजय को एक थप्पड़ क्या मार दिए, शेर बने फिरते थे, पद्मावती के सेट में आग लगा दिये तो क्या फिल्म नहीं बनी? फिल्म तो बननी ही थी। थप्पड़ भी खाना था और तंबू में आग भी लगवाना था। देखे दिमाग, पीएम को भी बोलना पड़ा था। जब संजय राजस्थान में पद्मावती की शूटिंग कर रहे थे और हुड़दंगी उनको परेशान किए थे तो उस समय सही कहा था हमारे पीएम महोदय ने कि कला की कोई सीमा नहीं होती। अब फिल्म बन के तैयार है। दिसंबर में रिलीज होगी। और हमको ई भी पता है कि संजय के तंबू में जो लोग आग लगाये थे, वे सबसे पहले जाएंगे पद्मावती को देखने कि वो क्या गुल खिला रही है अलाउद्दीन के साथ। अरे हम फिल्म की बात कर रहे हैं। नजर में ही खोट है तो गलत ही समझोगे न। इसी बात पर भंसाली को थप्पड़ियाये थे न कि उ काहे अलाउद्दीन और पद्मावती को रंगरेलियां मनाते दिखा रहा है।

संजय बार-बार चिल्लात रहा कि अरे हमें जैसा सोचत हो, हम वैसा नहीं हैं, हमने पद्मावती के साथ अलाउद्दीन को कुछ करते नहीं दिखाया है, लेकिन दिमाग में तो बैठ गया था कि संजय गड़बड़ दिखा रहा है, इतिहास को कलंकित कर रहा है तो वो कोई क्या करे। अब सिनेमाहॉल में जाकर देखना तो बताना कि क्या देखे, लेकिन भगवान के लिए फिल्म को रिलीज होने दो। जब छोटे थे तो बाबूजी पढ़ने के लिए बोले थे लेकिन चले गए सिनेमा देखने, बाबूजी ने खूब लपड़ियाया था। याद है?

हमारे कहने का ये मतलब है कि संजय फिल्म बना रहे हैं, इतिहास की किताब नहीं लिख रहे। उन्हें पता है कि बिना दिलचस्पी के लोकप्रियता नहीं हासिल की जा सकती और जब विषय में दिलचस्पी नहीं पैदा होगी तो स्वाभाविक सी बात है कि वो बोझिल हो जाएगा, मतलब पिक्चर फ्लॉप। अब ये मत कहना कि तो क्या इसका मतलब संजय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर परोसेंगे?

अरे इतिहास को किसने नहीं तोड़ा, किसने नहीं उसकी बांह मरोड़ी? जो सरकार आती है, वो एक नया चैपटर किताब में ठूंस देती है या पूरी किताब ही बदलवा देती है। सरकारों का क्या, पढ़ना तो बच्चों को है। एक तो ऐसे ही कितना मुश्किल से गुरुजी की पाठ याद हो पाती है, ऊपर से जैसे ही याद होती है, चैपटर चेंज। गजब हाल है। जितना में एक किताब खरीदेंगे, उतना में महीने भर लेमनचूस की खुराक मिल जाएगी, लेकिन बचपन जाए तो जाए, करेंगे अपना ही।

भाई देखो हमें तो फिल्म देखनी है। जब इतिहासकारों ने ही इतिहास लिखते समय न्याय को ताक पर रख दिया है तो हम इस पचड़े में क्यों पड़ें। ट्रेलर में फिल्म का आलीशान सेट, रणवीर सिंह और दीपिका की शानदार एक्टिंग देखकर अब और नहीं रहा जाता। आप भी इंतजार कीजिए, पद्मावती की रूह रुपहले पर्दे पर जल्द ही नजर आनेवाली है और वो भी जीते-जागते शरीर में।

 

 

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